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Friday, 10 February 2012

सूरज



बहुत दिनों बाद -

आज सूरज देख रहा हूँ
ये बात न समझना
घर से निकला न था
निकला था अक्सर बाहर
अंजान पगडंडियों पर
लेकिन उधर नहीं चला था
जहाँ केवल तुम थे-अकेले

बहुत गहरी थी मेरी
यादों की काली रात
बड़ी बड़ी खाईयां थीं
कुछ कठोर चट्टानें भी
जो उगी थी मौन से


कल मेरे मौन ने मुझसे
कहा था अकेले में ही -
मैं उसकी हत्या कर दूँ
संवाद का सेतु तान दूँ
प्रीत के आँगन तक
मन ने निर्णय कर लिया
देखो आज सवेरा हो गया
बहुत दिनों के बाद मैं
आज सूरज देख रहा हूँ






केदार नाथ "कादर"






Tuesday, 7 February 2012



आदमी हूँ मैं


कभी लगता है खुद से अजनबी हूँ मैं
भीड़ में कोई बिछड़ा सा आदमी हूँ मैं

बहुत लोग दिखते हैं फरिश्तों की तरह
अजीब रोग है मुझको आदमी हूँ मैं

उम्मीद से रिश्ता है हारे हुओं का एक
है हाथ में तलवार वो आदमी हूँ मैं

लिखते और भी हैं धुंआ-धुंआ सा लोग
दिल में चिराग रौशन वो आदमी हूँ मैं

बम्ब हूँ जिसे जला सकते नहीं "कादर"
सोतों को जगाये जो वो आदमी हूँ मैं

केदारनाथ "कादर"







Friday, 19 August 2011

दोस्तों अब ये झंडा झुका दो

ये जो होता है सोचा नहीं था
ये बुरा खवाब अपना नहीं था
आदमी कैसे-कैसे बिक रहा है ?
हमको अब कोई तो जवाब दो
दोस्तों अब ये झंडा झुका दो

पेट बच्चों का भरने की खातिर
एक माँ ने अपनी अस्मत लुटाई
है हर एक खतरे की जद में
चाहे बहना हो या चाहे भाई
अरे कोई तो इनको बचा लो  
दोस्तों अब ये झंडा झुका दो

जान अपनी बचाने की खातिर
मियाँ ने बीबी किराये चढ़ाई
एक ग़रीब बेटे ने खुद ही
चाह में मुफ्त कफ़न की
बाप की लाश लावारिस बताई
दोस्तों अब ये झंडा झुका दो


जब बहशी हवा बह रही है
गरीबों की बेटियाँ जल रही है
बिन ब्याहे ही कोखों में देखो
कितनी औलादें पल रही हैं
दोषियों को कोई तो सजा दो
दोस्तों अब ये झंडा झुका दो


हर जगह है खून खच्चर
कहीं धमाके कहीं दुर्व्यवस्था
आदमी जानवर हो चला है
याद रखो इंसानियत को
न कुर्बानियों का ऐसा सिला दो
दोस्तों अब ये झंडा झुका दो

Kedar nath”kadar”



बाकी है अभी

कहाँ थमा आतंक सत्ता का अभी
क्यूँ कहें आज़ाद हम भी हैं अभी

रक्त पिपासा शांत कहाँ हुई अभी
स्वर्ग की आकांक्षा अधूरी है अभी

मुक्त हुआ नहीं मानव मन अभी
पथ ही पथ है मंजिल कहाँ अभी

हुए कहाँ शिक्षित मनुजों हम अभी
स्वातंत्रय बोध शिक्षा बाकी है अभी

गीत स्वतन्त्र हो गाना बाकी अभी
स्वराज सच्चा आना बाकी है अभी

केदारनाथ "कादर"

आँखों में

ने क्या ढूंढती हो तुम वीरान आँखों में
छेड़ो न तुम छिपे हैं कई तूफान आँखों में

क्या खोजती हो दफ़न की राख में अंगारे
बुझ गए चिराग अँधेरे हैं बाकी आँखों में

पक गए बाल मेरे, बोल भी अस्थिर सारे
अब बचे नहीं निशाँ मुस्कुराहटों के आँखों में

ये नज़र खामोश रही तो न होगी कोई चर्चा
बहुत से सवाल जगे हैं इन सोई आँखों में

केदारनाथ "कादर"




याद

याद उसकी दिल को जब जब आती है
खुशबू उसकी फजाओं में बिखर जाती है

दिल तो कहता है जोर से पुकारूँ उसको
जाते जाते मेरी आवाज़ ठहर जाती है
याद आता है अहसास जुदाई का मुझे
उसी लम्हे कयामत सी गुजर जाती है


क्या करूँ दिल था डूबा तो उभर न सका
वर्ना लोहे की कश्ती भी उभर जाती है


देख भर ले कभी उठा कर पर्दा "कादर"
कहते हैं नज़रों से तकदीर संवर जाती है

केदारनाथ "कादर"

इसी कारण वे लड़ रहे हैं




सोते लोग चलते नहीं लगते अच्छे
जागे लोग जगाते हुए चल रहे हैं


भीड़ में लोग आगे चल रहे हैं
चिराग उनके दिलों में जल रहे हैं

युद्धरत हैं स्वयं से सिरफिरे से
दूसरों के लिए ही वे जी रहे हैं

जन की,जीवन की, जनहित की
उमंगें वे ही महसूस कर रहे हैं

है गुंथी आभा विरोध की, आत्मा की
वे एक आदिम युग बदल रहे हैं

शब्दों की धार से बैठ अनसन पर
वे सत्ता को कुंठित कर रहे हैं

जीत हो इंसान की, व्यवस्था की
इसी कारण वे लड़ रहे हैं

केदारनाथ "कादर"



अब हो गया है मुझको
मेरे अकेलेपन से ही प्यार
जहाँ मैं हूँ
और तू पिया


अकेलापन मेरा
ले आया तुम्हें
नहीं अब बीच
कोई दूसरा


तुम्हारी सोच है
तुम्हारा साथ भी
कोई जाने नहीं
है हाथों में हाथ भी


फैली जुल्फें
मेरे सीने पे
देखती खुद को
आँखे तेरी


मेरी अधखुली आँखों में
बह रहा है समुद्र
प्रेम का
तैरते हैं जिसमें
हम तुम
मेरे अकेलेपन में
मैंने पाया
स्वर्णिम सुगन्धित
सान्निध्य तेरा


केदारनाथ  "कादर"  




आजाद

आजादी इक ख्याल है
तुम देखो न जागकर
क्यूँ पालते हो स्वप्न
तुम स्वतंत्र भारत के
सपनों के बीज भी
तुमने विदेशी ही चुने
भूल बैठे तुम पुरुषार्थ
रखते रहे बस शर्तें
हुए कहाँ तुम आजाद
आज भी गुलाम सोच
आज भी गुलाम तुम
तोड़ दो ये बंदिशे
और फिर जियो तुम
आजाद होकर निसदिन

केदारनाथ "कादर"

Friday, 5 August 2011

चर्चा बेमानी हो गयी

यारो आजकल ईमान की चर्चा बेमानी हो गयी
बात अब सच्चाई की किस्सा कहानी हो गयी

देखिये हर एक को बनता है पोता गाँधी का
उम्र जिनकी रोज़ खून में नहाते हो गयी

हाथ में खंजर लिए जपते हैं जो राम राम
दौर-ए-अज़ब में जनता उनकी दीवानी हो गयी

जी ही लेंगे चार दिन अब यकीन है हमें
सुनते हैं तारीख चुनावों कि तय हो गयी

अब चुने हम किसको, कसाई हैं सब जगह
दिल की नगरी सबकी कब्र जैसे हो गयी

कृष्ण भी नाराज़ हैं और राम भी हैं खफा
सीता और राधा शाहरुख़ की दीवानी हो गयीं

Kedarnath “kadar”


अबोले-शब्द

बहुत से शब्द अबोले हैं
जब से छुआ है तुमने अँधेरे में
बहुत सी बातें हैं कहनी मुझे
पर सारे मेरे शब्द मदहोश हैं
तुम जो बांधे हो मुझे, प्रिये !
अपने कोमल बाहुपाश में

कुछ जो बोलूँ तो बोलूँ कैसे?
लव ये खोलूँ तो खोलूँ कैसे ?
तेरी छुअन से हुआ झंकृत
मेरा रोम-रोम तनमन का
तेरी यादों में यदि मद इतना
होगा क्या जब तुम होगी , प्रिये!
सच में साकार मेरी बाँहों में


Kedar nath “kadar”

Thursday, 28 July 2011


अजब शहर

अजब शहर है मेरा चलते पत्थरों का
दिल है, दर्द है, मगर प्यार नहीं है

चलते हैं साथ साथ बनकर हमसफ़र
हाथों में हाथ है पर एतबार नहीं है

हर एक है तैयार ताने हुए पत्थर
भीड़ में क्या कोई गुनाहगार नहीं है


कौन सुनता है दिल की सदा कहिये
व्यापार है वादों का , पर प्यार नहीं है

हम छोड़ भी दें शहर, न होगा विराना
इसे "कादर" इंसान की दरकार नहीं है



केदारनाथ "कादर"
 






धन्यवाद

जानते हो दुःख ....
क्यूँ चाहता हूँ तुम्हें ?

तुम ही हो मुझसे

ठुकराए हुए, लाँछित
अवांछित, आवारा
या...सच्चे मित्र

कब त्यागते हो तुम ?
पूरी तरह किसी को
लौट ही आते हो तुम
आती साँस की तरह

अब तो मैं तम्हें -
प्रिय भी कहने लगा हूँ
तुम्हारी आमद से ही
कुछ इंसान हुआ हूँ

हाँ, इसके लिए आज मैं
तुम्हें धन्यवाद देता हूँ
मेरे इस मन में घर
अपना बनाने के लिए


केदारनाथ "कादर"




ओ ! कामिनी, मधुवर्षिणी

तू मधु बरसाती चल
तू यौवन छलकाती चल



मुग्ध करती चल नयन को
चूम ले उड़कर गगन को
तू झंकृत करती स्वरों को
चपल पायल बजती चल

ओ ! कामिनी, मधुवर्षिणी
तू मधु बरसाती चल
तू यौवन छलकाती चल


कर विकल पलपल चपल
तू चित को चुराती चल
धर दामिनी सी छवि चंचल
मेरा मन लुभाती चल

ओ ! कामिनी, मधुवर्षिणी
तू मधु बरसाती चल
तू यौवन छलकाती चल

केदार नाथ "कादर"

मौत

मौत






वो दौड़ा किया बदहवास


बचने को यहाँ- वहाँ


मौत महबूब दिखी उसको


वो गया जहाँ-वहाँ


नाहक वो परेशान हुआ

वह भटका कहाँ -कहाँ


डरता रहा "कादर" मौत से


वो जिन्दा रहा कहाँ



Kedarnath”kadar”


                                                    बुद्ध


मैं लड़ता हूँ एक युद्ध


जो है मेरे ही विरुद्ध


मैंने ही किये हैं अनचाहे


                               द्वार विचार सब रुद्ध






मन है बड़ा मचलता


मुझसे है बहुत क्रुद्ध


संयम की राह से ही


हम होंगे "कादर" बुद्ध

kedarnath"kadar"

Saturday, 25 June 2011




औरों के लिए
मैंने हर लफ्ज़ लिखा जिसके लिए
वो मचलता रहा ताउम्र औरों के लिए

मैं समझता रहा छाई घटा मेरे लिए
खिला वो गुल था सिर्फ भौरों के लिए

मेरा बज़ूद ख़ाक हुआ जिसके लिए
वो रहा पढता कसीदे गैरों के लिए

मेरे मरने के बाद मेरी कब्र पे लिखना
"कादर" जिया ये जिंदगी औरों के लिए


kedar nath “kadar”




मैं दर्द से प्यार करता हूँ


क्यूँ पूछते हो किस से प्यार करता हूँ
जिसे न चाहे कोई उससे प्यार करता हूँ

अजीब शख्स हूँ, जानता ये मैं भी हूँ
यही बजह है बे-ग़रज प्यार करता हूँ

मैं आह-ओ- शर्द से प्यार करता हूँ
मैं राह की गर्द से प्यार करता हूँ

डर है हैवान बन न जाऊँ "कादर"
इसलिए मैं दर्द से प्यार करता हूँ

Kedarnath “kadar”





बुरी तरह आदमी से हारे हैं


आज कल हम कितनी बहस करते हैं, कितने लड़ते झगड़ते हैं व्यर्थ की बातों में और एक दूसरे को दुखी भी करते हैं. रास्ते से जाते समय मैंने देखा कि बहुत से आवारा कुत्ते शादी समारोह से बची झूठन खा रहे हैं. न कोई शोर न गुर्राहट, न कोई झगडा . तब इंसान को सामने रखकर ये पंक्तियाँ उभर आईं जो आप से साँझा कर रहा हूँ जी :-

एक जगह बहुत से कुत्ते
असीम शांति के साथ
खा रहे थे झूठन मिलकर 
बिना किसी नोंक झोंक
बिना गुर्राए , बिना भौंके

आश्चर्यजनक था ये दृश्य
इसलिए जिज्ञासावश मैंने पूछा-


स्वान देव आप लोग आपस में
लड़ते झगड़ते क्यों नहीं हैं?
तब उनका नेता बोला :-
अब हम आपस में नहीं लड़ते
हम शर्म के मारे हैं
इस लड़ने झगड़ने की कला में
बुरी तरह आदमी से हारे हैं





Kedar nath “kadar”


Friday, 24 June 2011






इस दिल से तल्ख़ यादों को मिटा दे

हसरतों को तू कोई और जगह दे


इंसान की काठी कमजोर बहुत है

मिटटी में इसकी कुछ और मिला दे


हसरतों की बरातों को जगह नहीं है

शैतानो की बस्ती को शमशान बना दे


ऐ औरों के खुदा "कादर" की तमन्ना है

जो कर सके प्यार, वो इंसान बना दे


केदारनाथ "कादर"