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Sunday, 9 March 2014

चाक़ू छुरियाँ

अब चाक़ू छुरियाँ और तलवारों की नहीं जरुरत 
"मसीहा" बांटने और काटने को रहनुमा बहुत हैं 

शब्द मसीहा 

माचिस


झीने से कपड़ों में संवेदना 
डर जैसी ही मालूम होती है 
हर आदमी इसे सहेजता है 
पर चोरी से आँखें हमारी 
या फिर लड़खडाती जुबान 
उठा ही देती है ...पर्दा 
सच से होते बालात्कार का 
नीचा  हो जाता है सिर 
टपक पड़ता है ...पैरों में खुद के 
और हम सम्हालने के लिए 
लगाते हैं झूठ का सीमेंट 

मैंने  सुना है सफ़ेद सीमेंट 
बहुत मजबूत होता है 
ओह ! इसीलिए बड़े लोगों के घर 
सफ़ेद पत्थर और सीमेंट से बनते हैं 
सफ़ेद गाड़ियों में चलते हैं 
सफ़ेद कपडे पहनते हैं 
सफेदपोश लोग कहाते हैं 

सच एक बम्ब होता है 
बस जरुरत है ...शब्दों के पलीते की
ताकि सच फ़ैल सके विस्फोट संग 
दूर दूर तक ..हर बस्ती में 
झूठ के जंगलों को जलाते हुए 
हाथ जोड़ता हूँ यारो ..माचिस हो जाओ 

शब्द मसीहा 





Tuesday, 4 September 2012

आँखें




जब भी आती हैं ख्यालों में, दो कजरारी तुम्हारी आँखें
कितने मधुर फूल खिला जाती हैं, चंचल तुम्हारी आँखें

यूँ लगता है खामोश हैं, आईने सी ये तुम्हारी आँखें
कैसी कैसी बातें बनाती हैं, ये वाचाल तुम्हारी आँखें

ढलते ही शाम चरागों सी, जलती हैं ये तुम्हारी आँखें
मेरी हर राह को रोशन, करती हैं ये दो तुम्हारी आँखें

सनम मुझसे दूर हो तुम, मेरे पास है तुम्हारा चेहरा
ढूँढती रहती हैं तुमको ही, हर पल ये हमारी आँखें

हम तो सोते हुए रखते हैं, सदा खुली ये अपनी आँखें
जाने किस रोज लौट आयें, मुझतक ये तुम्हारी आँखें

हमें हर गीत गाते हुए बस, तुम ही याद आते हो प्रिय
अक्सर उठ जाती हैं इस सारे शहर की मुझ पर आँखें

तुमको इन आँखों में मैंने बंद, सपने सा अपने रखा है
"कादर" तुम्हारे साथ ही होंगी, बंद सनम ये हमारी आँखें


केदारनाथ "कादर"

Wednesday, 21 March 2012

संसद में गरीबी रेखा और गरीबों का बहुत ही भद्दा मजाक उड़ाया जा रहा है .

हैरानी होती है जब आंकड़ों के गणित से ओर सरकार की इच्छा के अनुसार
आंकड़ों में हेरा फेरी करके रातों-रात पांच करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर
आ जाते हैं . इतने तीव्र विकास पर हैरान है आम आदमी .
आम आदमी की जुबान में एक रचना आप सब को समर्पित करता हूँ जी :-

संसद में आम आदमी के नुमाईंदे
बड़े गर्व से करते हैं ये घोषणा कि
भारत में अब विकास हो गया है
गरीब आदमी अब अमीर हो गया है
सरकारी नीति के कारण पाँच करोड़
लोग अब छाती फुलाकर कह सकेंगे
गर्व से कि वे अब गरीब नहीं हैं
एकाएक विकास सुनामी से देश में
उद्योग बढ़ गए हैं आम आदमी के लिए
लेकिन आंकड़े बता रहे हैं कि बे-कफ़न
लाशों को लोग छोड़कर जा रहे हैं
अंतिम रस्म का खर्च इतना है कि
परिवार के पाँच लोग एक दफ़न के लिए
सरकार महीने भर से घास खा रहे हैं


केदारनाथ "कादर"

Tuesday, 21 February 2012

खाई





कल मन से मुलाकात हुई
मैंने पूछा तुम कैसे हो ?
मन घबराया और बोला -
तुम्हें नहीं मालूम क्या ?
प्रश्न अपेक्षित नहीं था मुझे
क्या जवाब दूँ मैं मन को
ओह ! आज पता चला की
मेरे और मन के बीच भी
एक खाई है सवालों की
मन बार-बार धकेलता है
गहरा और गहरा इसमें
हर बार आता है हाथ मेरे
एक जख्म जो दबा था कहीं
गहरे इस खाई में गहरी
मुझे बेधते प्रश्न क्रूर हैं
किसी बधिक के तीरों से
मैं तैरता रहता हूँ अथक
भावनाओं की लहरों पर
मन भँवर उठाता रहता है
कोई अस्त्र काम नहीं करता
कोई तरकीब नहीं चलती






कल कुछ समय विलग था
मैं अपने बेकाबू मन से
तब सोचा मैंने , ये खाई
कहाँ से उपजी है मेरी ?
मुझे लगता था कि मैं
कुछ विशेष हूँ शायद
कल कईयों से बात हुई
बहुत निराशा हुई मुझे
ये जानकार कि सब-
मुझ जैसे ही हैं यहाँ
अपनी अपनी खाई सहेजे
सब तिरोहित हैं यहाँ
अपनी प्रश्न लहरों पर
इसीलिए हर एक मूक है
बस मुखरित प्रश्न हैं
और गूंजती खाई है
सबकी अपने मन की






केदार नाथ "कादर"










सपनों का भारत







कल सपनों का भारत ढूँढ रहा था
वह कितना सुंदर स्वप्न था उनका
भूख और बेकारी से पूर्णतया मुक्त
वह तो केवल स्वप्न ही रह गया
उन्होंने तो कोई कमी न रखी थी
अपना लहू तक बहाया था, परन्तु
वे सोच का बीज न डाल पाए सही
आज की नई पीढ़ी अक्सर उनपर
फव्तियाँ कसती है , हँसती है
क्या पाया उन्होंने-इस लड़ाई में
किनको सौंप दी अपनी विरासत ?
उफ़ ! सब मांसखोर भेड़िये, रक्षक
क्या हो गया है इस तंत्र को
क्या यही उगलता है ये जनतंत्र
अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी, असमानता
आक्रोश, विद्रोह और पतन
ओह! नहीं, ऐसा तो नहीं होता



जनतंत्र की बाड़.जन ही बनें
तभी भेडियों से हक बचेगा
देखो भेडियों की टोलियाँ
घूमती है चुनाव के मौसम में
सावधान रहना इनकी लपलपाती
खून सनी जीभ से मतदाताओ
तुम्हारा मत ही तुम्हारा हथियार
अगर नहीं जागे तो याद रखो
झंडा लपेटकर भी तुम शहीद नहीं
वरन आतंकवादी ही कहाओगे
हाँ, युद्ध करो खुद से पहले, तब
इन्हें दोष देना, इस व्यवस्था का
छेद बंद कर दो, लहू बहना बंद
स्वयं हो जायेगा इनके कटोरों में


आओ अब चलें चुनाव का दिन है
तिरंगा सजाओ अपने दिल में
देश को पहले रखो, खुद से
और फिर दबाओ बटन तुम
अपने और जन के नए भविष्य का
ताकि फिर कोई देश का बच्चा
हाथ में झंडा लिए जय हिंद लिखा
जयघोष नंगा होकर न करे
भूखा रहकर वन्देमातरम न कहे



केदारनाथ"कादर"

Wednesday, 15 February 2012

दूर के सवाल नजदीक से




आजकल चुनाव का माहौल है चारों ही ओर एक दुसरे पर कीचड़ उछाला जा रहा है. अलग अलग नौटंकी देखने को मिल रही है. हर पार्टी ने अपने अपने खोमचे सजा रखे हैं और हर एक वादों का मिष्ठान परोस रहा है. वादे भी बहुत सुहाने हैं इनके कुछ वादों पर नज़र डालें :



आजकल जबसे कांग्रेस के कपिल सिब्बल साहब ने आकाश नाम के टेबलेट की बात कर एकाएक भारत को हाईटेक बना दिया है. अब हर विद्यार्थी बस हाथ में टेबलेट लिए घूमता हुआ नज़र आ रहा सपने में. कीमत बहुत कम है.. हर एक को मिलेगा बस एक बार हाथ के निशान पर बटन दबा दो . प्रेरणा बड़ी चीज़ है...सो समाजवादियों ने भी ले ली. पहले वह कंप्यूटर का विरोध कर रहे थे लेकिन अब बहती गंगा में उन्होंने भी हाथ धो लेना ही मुनासिब समझा है. वैसे भारत के हर प्रान्त में लोग आशावादी हैं और आश्वासन की खेती यहाँ बिना खाद डाले ही होती है..पनपती है और फलती भी है. इसमें कोई ख़ास निवेश नहीं होता..केवल कुछ मीठे शब्द ..दूसरों की कमियाँ गिनाओ...आम आदमी नामक पशु से थोड़ी हमदर्दी दिखाओ और सत्ता पक्ष की बुराई करो और कुछ लुभावने नारे ...किराये के आदमियों से लगवाओ ...फिर बटन आपका और बटन दबाने वाला आप का गुलाम...



कभी सवाल करो की नेता जी आप ये पैसा कहाँ से लोगे ?..भाई जो पैसा आपके विकास के लिए आएगा उसमें से ही आपको बाँटेंगे न. तब फिर विकास को भूल जाओ . आपके बच्चों को स्कूल नहीं हैं..घरों में बिजली नहीं है..इन्टरनेट का किराया भरने को पैसा नहीं है..क्या करोगे कम्प्यूटर और लैपटाप का . आकाश भी एक बड़ा घोटाला साबित होगा...भविष्य तो यही दिखा रहा है..लेकिन भगवान् से यही विनय है की ऐसा न हो...इस आम आदमी नामक जंतु का एक मुंगेरी सपना सच कर दे. ये तो भूखा रहने का आदी हो ही चूका है सो भूखे पेट ही लैपटाप चला लेगा ..चाहे काला अक्षर भैंस बराबर हो. कपिल सिब्बल साहब को इस देश के बच्चों की बहुत फिकर है इसलिए शिक्षा पद्धति को बहुत बदल डाला गया है. अब आठवीं कक्षा तक कोई विद्यार्थी फेल नहीं होगा ..बोर्ड का एक्साम नहीं होगा..बच्चों की बल्ले बल्ले ...कोई बच्चा अब आत्म हत्या नहीं करेगा..कोई टेंसन नहीं होगी...सब गरीबों का एक ही बार में खत्म हो गया . न वह काबिल होगा न कभी नौकरी मांगेगा..बस बनकर रहेगा गुलाम इनकी औलादों का ....क्यूंकि इनके बच्चे तो बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं न...वहां तो अधिकारियों की जमात होती है..नेताओं की फसल उगती है ....क्या कहें..मलाई होती है..आजकल उसे क्रीम कहते हैं. सो ये खिलौने तुम्हारे विकास के बीच बाँध ही बनेंगे . वैसे हर पार्टी को एक नयी परियोजना का सुझाव है..पूरे देश को शिक्षित करने का..सबको फ्री में डिग्रियां बाँट दो ग्रेजुएसन की.......एक ही झटके में देश साक्षर . जी हाँ मुझे मेरे बेटे ने बताया की 73 देशों की पुस्तक पढने और गणित प्रतियोगिता हुई थी और भारत के बच्चे पुस्तक पढने और गणित प्रतियोगिता में अंतिम स्थान पर थे..जय हो कपिल सिब्बल साहब.



विकास का लोलीपोप सब पार्टियाँ लाइन लगाकर दे रहीं है. सब कहते हैं विकास होगा ..अगर उनकी पार्टी को जीत हासिल हुई. लेकिन होगा क्या? अगर वे सत्ता में आये हैं और जिस क्षेत्र से उनका उम्मीदवार जीतकर नहीं आएगा ...वहाँ का विकास बंद ..बिजली बंद ..सडकें बदहाल..कोई सुविधा नहीं मिलेगी...हर फ़ाइल को लटका दिया जायेगा मंत्रालय में..यानी यातना आम आदमी को ही मिलेगी . कुछ तो दबंगई का शिकार भी होंगे ...भाई ये नेता भी कोई राजा से कम नहीं हैं...बस फर्क यही है की ये पांच साल के हैं..और तुम्हें राहत ये की ...नए नेता का सपना देखने का तुम्हारा अधिकार सुरक्षित है आखिर लोकतंत्र है भाई.....विश्व का सबसे बड़ा .....जन तंत्र ...जहाँ जन को तंत्र में उलझा कर ..घुटघुटकर मरने के लिए लिए शातिर नेता बाध्य करते हैं.....ईश्वर इनको प्लास्टिक के कीड़े पड़ें...हर आदमी यही दुआ मांगता है..चुनाव के कुछ समाय बाद .



वैसे सरकार बहुत जागरूक है ...अच्छे खासे मुनाफा देने वाले अनेक उद्योगों और कारखानों को विनिवेश के नाम पर...बड़े बड़े घरानों को बेच चुकी है..और बाकी बचे भी जल्द ही इनकी झोलियों में पहुँचने की तैयारी कर रहे हैं. सेज के नाम पर कितने ही आम आदमियों की जमीन कौड़ियों के भाव बेच दी और दलाली का पैसा भी विदेशों के बैंकों की शोभा बढ़ा रहा है. सरकार को विकास नाम का भूत..चिराग में रखने का मंतर आता है भाई.

हो सके तो किसी नेता से ये पूछ लेना ...लेकिन याद रखना पैर में जूते न हों तुम्हारे ...जेब में कोई स्याही की बोतल न हो...हाथ में काला रूमाल भी नहीं होना चाहिए....वर्ना नेताजी के समर्थक तुम्हारा कल्याण कर देंगे......और हो सकता है तुम्हारे सूखे गाल ...लाल हो जायें ..या तुम्हें पता चले की तुम्हारे शारीर का विकास हो गया..एक हड्डी की दो बन गयीं ....haan जाने से पहले उनके नाम का जैजैकार जरुर करना..यही तो सीधी है मंच तक पहुँचने की .......



आज इतना ही ...आम आदमी के लिए कहूँगा..बाकी मरहम फिर लगाऊँगा ...तुम्हारे नए घावों पर

Friday, 10 February 2012

सूरज



बहुत दिनों बाद -

आज सूरज देख रहा हूँ
ये बात न समझना
घर से निकला न था
निकला था अक्सर बाहर
अंजान पगडंडियों पर
लेकिन उधर नहीं चला था
जहाँ केवल तुम थे-अकेले

बहुत गहरी थी मेरी
यादों की काली रात
बड़ी बड़ी खाईयां थीं
कुछ कठोर चट्टानें भी
जो उगी थी मौन से


कल मेरे मौन ने मुझसे
कहा था अकेले में ही -
मैं उसकी हत्या कर दूँ
संवाद का सेतु तान दूँ
प्रीत के आँगन तक
मन ने निर्णय कर लिया
देखो आज सवेरा हो गया
बहुत दिनों के बाद मैं
आज सूरज देख रहा हूँ






केदार नाथ "कादर"






पुनरावृत्ति नहीं समय की



पुनरावृत्ति नहीं समय की

मन बैल सम मत घूम
आजा भर ले आज तू
अपने मिलन की माँग
उठ जाग, ले गागर चल
छाए आँगन प्रीत घन
गाए पवन, महके सुमन
कहता है मन, अभी चल
हर ले अपनी हर दहन
              पुनरावृत्ति नहीं समय की
              मन बैल सम मत घूम

प्रिय खड़े मन द्वार पर
लेकर सुगढ़ कर माल
शीश क़दमों में झुकाकर
जीत ले मन प्राण
हो जा मूर्ख मन सरल
बह संग प्रिय अविरल
भर माँग माथे की
धर ध्यान की ज्योति
कर ले जीवन सफल


                पुनरावृत्ति नहीं समय की
                मन बैल सम मत घूम

केदार नाथ "कादर"


Tuesday, 7 February 2012



आदमी हूँ मैं


कभी लगता है खुद से अजनबी हूँ मैं
भीड़ में कोई बिछड़ा सा आदमी हूँ मैं

बहुत लोग दिखते हैं फरिश्तों की तरह
अजीब रोग है मुझको आदमी हूँ मैं

उम्मीद से रिश्ता है हारे हुओं का एक
है हाथ में तलवार वो आदमी हूँ मैं

लिखते और भी हैं धुंआ-धुंआ सा लोग
दिल में चिराग रौशन वो आदमी हूँ मैं

बम्ब हूँ जिसे जला सकते नहीं "कादर"
सोतों को जगाये जो वो आदमी हूँ मैं

केदारनाथ "कादर"







NETA






हमें नाराज़ भी होने का अब हक नहीं यारो

बेचा है जैसे खुद को इन्हें वोट देकर यारो
बिकती है प्याज, पेट्रोल, बियर एक दाम पर
पानी भी बिक रहा है दूध के दाम पर यारो

झंडा जलाना मंजूर है मगर उसे फहराना नहीं
कैसे अज़ब हालात से देश गुजर रहा मेरा यारो

खून अब खून कहाँ है जो गर है गैरों का
आज इंसान जानवर सा मर रहा है यारो

बस मुफलिसी ही हमारी किस्मत में क्यों है
"कादर" ये सवाल ओहदों पे बैठों पूछ लो यारो



केदारनाथ "कादर"

Thursday, 19 January 2012

हम भटके हैं आस लिए, जाने किस मंजिल की,



कितने हैं बेखबर हम सारे, खबर नहीं है पल की



सब आयोजन ये अपने, हैं भटकन केवल मन की


बाज़ समय का कब चुग जाये सांसें इस जीवन की



भूख जानते हैं तन की , बिसराई बातें मन की


द्रोह किया खुद से पग-पग, राह चुनी बीहड़ की



जो बोया सो हम काट ही लेंगे, ये खेती कर्मों की


दीपमाथ जगाओ, बुझने से पहले ज्योति जीवन की



मंगल वचन स्मरण कर, करो बातें चिर जीवन की


पल केवल अभी बचा "कादर" त्यागो बातें कल की



केदारनाथ "कादर" ( १९.०१.२०१२)


Friday, 19 August 2011

दोस्तों अब ये झंडा झुका दो

ये जो होता है सोचा नहीं था
ये बुरा खवाब अपना नहीं था
आदमी कैसे-कैसे बिक रहा है ?
हमको अब कोई तो जवाब दो
दोस्तों अब ये झंडा झुका दो

पेट बच्चों का भरने की खातिर
एक माँ ने अपनी अस्मत लुटाई
है हर एक खतरे की जद में
चाहे बहना हो या चाहे भाई
अरे कोई तो इनको बचा लो  
दोस्तों अब ये झंडा झुका दो

जान अपनी बचाने की खातिर
मियाँ ने बीबी किराये चढ़ाई
एक ग़रीब बेटे ने खुद ही
चाह में मुफ्त कफ़न की
बाप की लाश लावारिस बताई
दोस्तों अब ये झंडा झुका दो


जब बहशी हवा बह रही है
गरीबों की बेटियाँ जल रही है
बिन ब्याहे ही कोखों में देखो
कितनी औलादें पल रही हैं
दोषियों को कोई तो सजा दो
दोस्तों अब ये झंडा झुका दो


हर जगह है खून खच्चर
कहीं धमाके कहीं दुर्व्यवस्था
आदमी जानवर हो चला है
याद रखो इंसानियत को
न कुर्बानियों का ऐसा सिला दो
दोस्तों अब ये झंडा झुका दो

Kedar nath”kadar”



बाकी है अभी

कहाँ थमा आतंक सत्ता का अभी
क्यूँ कहें आज़ाद हम भी हैं अभी

रक्त पिपासा शांत कहाँ हुई अभी
स्वर्ग की आकांक्षा अधूरी है अभी

मुक्त हुआ नहीं मानव मन अभी
पथ ही पथ है मंजिल कहाँ अभी

हुए कहाँ शिक्षित मनुजों हम अभी
स्वातंत्रय बोध शिक्षा बाकी है अभी

गीत स्वतन्त्र हो गाना बाकी अभी
स्वराज सच्चा आना बाकी है अभी

केदारनाथ "कादर"



याद

याद उसकी दिल को जब जब आती है
खुशबू उसकी फजाओं में बिखर जाती है

दिल तो कहता है जोर से पुकारूँ उसको
जाते जाते मेरी आवाज़ ठहर जाती है
याद आता है अहसास जुदाई का मुझे
उसी लम्हे कयामत सी गुजर जाती है


क्या करूँ दिल था डूबा तो उभर न सका
वर्ना लोहे की कश्ती भी उभर जाती है


देख भर ले कभी उठा कर पर्दा "कादर"
कहते हैं नज़रों से तकदीर संवर जाती है

केदारनाथ "कादर"

इसी कारण वे लड़ रहे हैं




सोते लोग चलते नहीं लगते अच्छे
जागे लोग जगाते हुए चल रहे हैं


भीड़ में लोग आगे चल रहे हैं
चिराग उनके दिलों में जल रहे हैं

युद्धरत हैं स्वयं से सिरफिरे से
दूसरों के लिए ही वे जी रहे हैं

जन की,जीवन की, जनहित की
उमंगें वे ही महसूस कर रहे हैं

है गुंथी आभा विरोध की, आत्मा की
वे एक आदिम युग बदल रहे हैं

शब्दों की धार से बैठ अनसन पर
वे सत्ता को कुंठित कर रहे हैं

जीत हो इंसान की, व्यवस्था की
इसी कारण वे लड़ रहे हैं

केदारनाथ "कादर"



अब हो गया है मुझको
मेरे अकेलेपन से ही प्यार
जहाँ मैं हूँ
और तू पिया


अकेलापन मेरा
ले आया तुम्हें
नहीं अब बीच
कोई दूसरा


तुम्हारी सोच है
तुम्हारा साथ भी
कोई जाने नहीं
है हाथों में हाथ भी


फैली जुल्फें
मेरे सीने पे
देखती खुद को
आँखे तेरी


मेरी अधखुली आँखों में
बह रहा है समुद्र
प्रेम का
तैरते हैं जिसमें
हम तुम
मेरे अकेलेपन में
मैंने पाया
स्वर्णिम सुगन्धित
सान्निध्य तेरा


केदारनाथ  "कादर"  




आजाद

आजादी इक ख्याल है
तुम देखो न जागकर
क्यूँ पालते हो स्वप्न
तुम स्वतंत्र भारत के
सपनों के बीज भी
तुमने विदेशी ही चुने
भूल बैठे तुम पुरुषार्थ
रखते रहे बस शर्तें
हुए कहाँ तुम आजाद
आज भी गुलाम सोच
आज भी गुलाम तुम
तोड़ दो ये बंदिशे
और फिर जियो तुम
आजाद होकर निसदिन

केदारनाथ "कादर"

Friday, 5 August 2011

चर्चा बेमानी हो गयी

यारो आजकल ईमान की चर्चा बेमानी हो गयी
बात अब सच्चाई की किस्सा कहानी हो गयी

देखिये हर एक को बनता है पोता गाँधी का
उम्र जिनकी रोज़ खून में नहाते हो गयी

हाथ में खंजर लिए जपते हैं जो राम राम
दौर-ए-अज़ब में जनता उनकी दीवानी हो गयी

जी ही लेंगे चार दिन अब यकीन है हमें
सुनते हैं तारीख चुनावों कि तय हो गयी

अब चुने हम किसको, कसाई हैं सब जगह
दिल की नगरी सबकी कब्र जैसे हो गयी

कृष्ण भी नाराज़ हैं और राम भी हैं खफा
सीता और राधा शाहरुख़ की दीवानी हो गयीं

Kedarnath “kadar”


अबोले-शब्द

बहुत से शब्द अबोले हैं
जब से छुआ है तुमने अँधेरे में
बहुत सी बातें हैं कहनी मुझे
पर सारे मेरे शब्द मदहोश हैं
तुम जो बांधे हो मुझे, प्रिये !
अपने कोमल बाहुपाश में

कुछ जो बोलूँ तो बोलूँ कैसे?
लव ये खोलूँ तो खोलूँ कैसे ?
तेरी छुअन से हुआ झंकृत
मेरा रोम-रोम तनमन का
तेरी यादों में यदि मद इतना
होगा क्या जब तुम होगी , प्रिये!
सच में साकार मेरी बाँहों में


Kedar nath “kadar”