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Sunday, 9 March 2014

चाक़ू छुरियाँ

अब चाक़ू छुरियाँ और तलवारों की नहीं जरुरत 
"मसीहा" बांटने और काटने को रहनुमा बहुत हैं 

शब्द मसीहा 

माचिस


झीने से कपड़ों में संवेदना 
डर जैसी ही मालूम होती है 
हर आदमी इसे सहेजता है 
पर चोरी से आँखें हमारी 
या फिर लड़खडाती जुबान 
उठा ही देती है ...पर्दा 
सच से होते बालात्कार का 
नीचा  हो जाता है सिर 
टपक पड़ता है ...पैरों में खुद के 
और हम सम्हालने के लिए 
लगाते हैं झूठ का सीमेंट 

मैंने  सुना है सफ़ेद सीमेंट 
बहुत मजबूत होता है 
ओह ! इसीलिए बड़े लोगों के घर 
सफ़ेद पत्थर और सीमेंट से बनते हैं 
सफ़ेद गाड़ियों में चलते हैं 
सफ़ेद कपडे पहनते हैं 
सफेदपोश लोग कहाते हैं 

सच एक बम्ब होता है 
बस जरुरत है ...शब्दों के पलीते की
ताकि सच फ़ैल सके विस्फोट संग 
दूर दूर तक ..हर बस्ती में 
झूठ के जंगलों को जलाते हुए 
हाथ जोड़ता हूँ यारो ..माचिस हो जाओ 

शब्द मसीहा 





Tuesday, 4 September 2012

आँखें




जब भी आती हैं ख्यालों में, दो कजरारी तुम्हारी आँखें
कितने मधुर फूल खिला जाती हैं, चंचल तुम्हारी आँखें

यूँ लगता है खामोश हैं, आईने सी ये तुम्हारी आँखें
कैसी कैसी बातें बनाती हैं, ये वाचाल तुम्हारी आँखें

ढलते ही शाम चरागों सी, जलती हैं ये तुम्हारी आँखें
मेरी हर राह को रोशन, करती हैं ये दो तुम्हारी आँखें

सनम मुझसे दूर हो तुम, मेरे पास है तुम्हारा चेहरा
ढूँढती रहती हैं तुमको ही, हर पल ये हमारी आँखें

हम तो सोते हुए रखते हैं, सदा खुली ये अपनी आँखें
जाने किस रोज लौट आयें, मुझतक ये तुम्हारी आँखें

हमें हर गीत गाते हुए बस, तुम ही याद आते हो प्रिय
अक्सर उठ जाती हैं इस सारे शहर की मुझ पर आँखें

तुमको इन आँखों में मैंने बंद, सपने सा अपने रखा है
"कादर" तुम्हारे साथ ही होंगी, बंद सनम ये हमारी आँखें


केदारनाथ "कादर"

Wednesday, 21 March 2012

संसद में गरीबी रेखा और गरीबों का बहुत ही भद्दा मजाक उड़ाया जा रहा है .

हैरानी होती है जब आंकड़ों के गणित से ओर सरकार की इच्छा के अनुसार
आंकड़ों में हेरा फेरी करके रातों-रात पांच करोड़ लोग गरीबी रेखा से ऊपर
आ जाते हैं . इतने तीव्र विकास पर हैरान है आम आदमी .
आम आदमी की जुबान में एक रचना आप सब को समर्पित करता हूँ जी :-

संसद में आम आदमी के नुमाईंदे
बड़े गर्व से करते हैं ये घोषणा कि
भारत में अब विकास हो गया है
गरीब आदमी अब अमीर हो गया है
सरकारी नीति के कारण पाँच करोड़
लोग अब छाती फुलाकर कह सकेंगे
गर्व से कि वे अब गरीब नहीं हैं
एकाएक विकास सुनामी से देश में
उद्योग बढ़ गए हैं आम आदमी के लिए
लेकिन आंकड़े बता रहे हैं कि बे-कफ़न
लाशों को लोग छोड़कर जा रहे हैं
अंतिम रस्म का खर्च इतना है कि
परिवार के पाँच लोग एक दफ़न के लिए
सरकार महीने भर से घास खा रहे हैं


केदारनाथ "कादर"

Tuesday, 21 February 2012

खाई





कल मन से मुलाकात हुई
मैंने पूछा तुम कैसे हो ?
मन घबराया और बोला -
तुम्हें नहीं मालूम क्या ?
प्रश्न अपेक्षित नहीं था मुझे
क्या जवाब दूँ मैं मन को
ओह ! आज पता चला की
मेरे और मन के बीच भी
एक खाई है सवालों की
मन बार-बार धकेलता है
गहरा और गहरा इसमें
हर बार आता है हाथ मेरे
एक जख्म जो दबा था कहीं
गहरे इस खाई में गहरी
मुझे बेधते प्रश्न क्रूर हैं
किसी बधिक के तीरों से
मैं तैरता रहता हूँ अथक
भावनाओं की लहरों पर
मन भँवर उठाता रहता है
कोई अस्त्र काम नहीं करता
कोई तरकीब नहीं चलती






कल कुछ समय विलग था
मैं अपने बेकाबू मन से
तब सोचा मैंने , ये खाई
कहाँ से उपजी है मेरी ?
मुझे लगता था कि मैं
कुछ विशेष हूँ शायद
कल कईयों से बात हुई
बहुत निराशा हुई मुझे
ये जानकार कि सब-
मुझ जैसे ही हैं यहाँ
अपनी अपनी खाई सहेजे
सब तिरोहित हैं यहाँ
अपनी प्रश्न लहरों पर
इसीलिए हर एक मूक है
बस मुखरित प्रश्न हैं
और गूंजती खाई है
सबकी अपने मन की






केदार नाथ "कादर"










सपनों का भारत







कल सपनों का भारत ढूँढ रहा था
वह कितना सुंदर स्वप्न था उनका
भूख और बेकारी से पूर्णतया मुक्त
वह तो केवल स्वप्न ही रह गया
उन्होंने तो कोई कमी न रखी थी
अपना लहू तक बहाया था, परन्तु
वे सोच का बीज न डाल पाए सही
आज की नई पीढ़ी अक्सर उनपर
फव्तियाँ कसती है , हँसती है
क्या पाया उन्होंने-इस लड़ाई में
किनको सौंप दी अपनी विरासत ?
उफ़ ! सब मांसखोर भेड़िये, रक्षक
क्या हो गया है इस तंत्र को
क्या यही उगलता है ये जनतंत्र
अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी, असमानता
आक्रोश, विद्रोह और पतन
ओह! नहीं, ऐसा तो नहीं होता



जनतंत्र की बाड़.जन ही बनें
तभी भेडियों से हक बचेगा
देखो भेडियों की टोलियाँ
घूमती है चुनाव के मौसम में
सावधान रहना इनकी लपलपाती
खून सनी जीभ से मतदाताओ
तुम्हारा मत ही तुम्हारा हथियार
अगर नहीं जागे तो याद रखो
झंडा लपेटकर भी तुम शहीद नहीं
वरन आतंकवादी ही कहाओगे
हाँ, युद्ध करो खुद से पहले, तब
इन्हें दोष देना, इस व्यवस्था का
छेद बंद कर दो, लहू बहना बंद
स्वयं हो जायेगा इनके कटोरों में


आओ अब चलें चुनाव का दिन है
तिरंगा सजाओ अपने दिल में
देश को पहले रखो, खुद से
और फिर दबाओ बटन तुम
अपने और जन के नए भविष्य का
ताकि फिर कोई देश का बच्चा
हाथ में झंडा लिए जय हिंद लिखा
जयघोष नंगा होकर न करे
भूखा रहकर वन्देमातरम न कहे



केदारनाथ"कादर"

Friday, 10 February 2012

सूरज



बहुत दिनों बाद -

आज सूरज देख रहा हूँ
ये बात न समझना
घर से निकला न था
निकला था अक्सर बाहर
अंजान पगडंडियों पर
लेकिन उधर नहीं चला था
जहाँ केवल तुम थे-अकेले

बहुत गहरी थी मेरी
यादों की काली रात
बड़ी बड़ी खाईयां थीं
कुछ कठोर चट्टानें भी
जो उगी थी मौन से


कल मेरे मौन ने मुझसे
कहा था अकेले में ही -
मैं उसकी हत्या कर दूँ
संवाद का सेतु तान दूँ
प्रीत के आँगन तक
मन ने निर्णय कर लिया
देखो आज सवेरा हो गया
बहुत दिनों के बाद मैं
आज सूरज देख रहा हूँ






केदार नाथ "कादर"






Thursday, 19 January 2012

हम भटके हैं आस लिए, जाने किस मंजिल की,



कितने हैं बेखबर हम सारे, खबर नहीं है पल की



सब आयोजन ये अपने, हैं भटकन केवल मन की


बाज़ समय का कब चुग जाये सांसें इस जीवन की



भूख जानते हैं तन की , बिसराई बातें मन की


द्रोह किया खुद से पग-पग, राह चुनी बीहड़ की



जो बोया सो हम काट ही लेंगे, ये खेती कर्मों की


दीपमाथ जगाओ, बुझने से पहले ज्योति जीवन की



मंगल वचन स्मरण कर, करो बातें चिर जीवन की


पल केवल अभी बचा "कादर" त्यागो बातें कल की



केदारनाथ "कादर" ( १९.०१.२०१२)


Friday, 19 August 2011


बाकी है अभी

कहाँ थमा आतंक सत्ता का अभी
क्यूँ कहें आज़ाद हम भी हैं अभी

रक्त पिपासा शांत कहाँ हुई अभी
स्वर्ग की आकांक्षा अधूरी है अभी

मुक्त हुआ नहीं मानव मन अभी
पथ ही पथ है मंजिल कहाँ अभी

हुए कहाँ शिक्षित मनुजों हम अभी
स्वातंत्रय बोध शिक्षा बाकी है अभी

गीत स्वतन्त्र हो गाना बाकी अभी
स्वराज सच्चा आना बाकी है अभी

केदारनाथ "कादर"

आँखों में

ने क्या ढूंढती हो तुम वीरान आँखों में
छेड़ो न तुम छिपे हैं कई तूफान आँखों में

क्या खोजती हो दफ़न की राख में अंगारे
बुझ गए चिराग अँधेरे हैं बाकी आँखों में

पक गए बाल मेरे, बोल भी अस्थिर सारे
अब बचे नहीं निशाँ मुस्कुराहटों के आँखों में

ये नज़र खामोश रही तो न होगी कोई चर्चा
बहुत से सवाल जगे हैं इन सोई आँखों में

केदारनाथ "कादर"




याद

याद उसकी दिल को जब जब आती है
खुशबू उसकी फजाओं में बिखर जाती है

दिल तो कहता है जोर से पुकारूँ उसको
जाते जाते मेरी आवाज़ ठहर जाती है
याद आता है अहसास जुदाई का मुझे
उसी लम्हे कयामत सी गुजर जाती है


क्या करूँ दिल था डूबा तो उभर न सका
वर्ना लोहे की कश्ती भी उभर जाती है


देख भर ले कभी उठा कर पर्दा "कादर"
कहते हैं नज़रों से तकदीर संवर जाती है

केदारनाथ "कादर"

Thursday, 28 July 2011

 






धन्यवाद

जानते हो दुःख ....
क्यूँ चाहता हूँ तुम्हें ?

तुम ही हो मुझसे

ठुकराए हुए, लाँछित
अवांछित, आवारा
या...सच्चे मित्र

कब त्यागते हो तुम ?
पूरी तरह किसी को
लौट ही आते हो तुम
आती साँस की तरह

अब तो मैं तम्हें -
प्रिय भी कहने लगा हूँ
तुम्हारी आमद से ही
कुछ इंसान हुआ हूँ

हाँ, इसके लिए आज मैं
तुम्हें धन्यवाद देता हूँ
मेरे इस मन में घर
अपना बनाने के लिए


केदारनाथ "कादर"




ओ ! कामिनी, मधुवर्षिणी

तू मधु बरसाती चल
तू यौवन छलकाती चल



मुग्ध करती चल नयन को
चूम ले उड़कर गगन को
तू झंकृत करती स्वरों को
चपल पायल बजती चल

ओ ! कामिनी, मधुवर्षिणी
तू मधु बरसाती चल
तू यौवन छलकाती चल


कर विकल पलपल चपल
तू चित को चुराती चल
धर दामिनी सी छवि चंचल
मेरा मन लुभाती चल

ओ ! कामिनी, मधुवर्षिणी
तू मधु बरसाती चल
तू यौवन छलकाती चल

केदार नाथ "कादर"

मौत

मौत






वो दौड़ा किया बदहवास


बचने को यहाँ- वहाँ


मौत महबूब दिखी उसको


वो गया जहाँ-वहाँ


नाहक वो परेशान हुआ

वह भटका कहाँ -कहाँ


डरता रहा "कादर" मौत से


वो जिन्दा रहा कहाँ



Kedarnath”kadar”

Monday, 20 June 2011

जिन्दा रहना है तो फिर हालात बदलना होगा



जिन्दा रहना है तो फिर हालात बदलना होगा


जनमानस को अपने ख्यालात बदलना होगा


हमको ये होता तांडव मृत्यु का छलना होगा


मरने से पहले न मरेंगे निश्चय करना होगा



निशा अँधेरी चहुँ ओर है तम को हरना होगा


मन और तन दोनों को बस में करना होगा



पाना ही होगा स्वाभिमान हमको लड़ना होगा


अब सत्ता वालों को जनता से डरना होगा



अपना हक खुशहाल जीवन उसको पाना होगा


जनमानस को अपना अंदाज़ बदलना होगा



स्वरों को फौलाद बनाकर शोर मचाना होगा


वंचितजन को सत्य दिखा सोच बदलना होगा



नए सवेरे की खातिर संघर्ष भी करना होगा


जिन्दा रहना है तो फिर हालात बदलना होगा





Kedarnath “kadar"

Wednesday, 15 June 2011

गंगापुत्र निगमानंद का बलिदान और आज का मीडिया


हरिद्वार गंगा में खनन रोकने के लिए कई बार के लंबे अनशनों और जहर दिए जाने की वजह से मातृसदन के संत निगमानंद अब इस संसार में नहीं रहे. हरिद्वार की पवित्र धरती का गंगापुत्र अनंत यात्रा पर निकल चुका है। भारतीय अध्यात्म परंपरा में संत और अनंत को एक समान ही माना जाता है, वे सच्चे अर्थों में गंगापुत्र थे. गंगा रक्षा मंच, गंगा सेवा मिशन, गंगा बचाओ आंदोलन आदि-आदि नामों से आए दिन अपने वैभव का प्रदर्शन करने वाले मठों-महंतों को देखते रहे हैं पर गंगा के लिए निगमानंद का बलिदान इतिहास में एक अलग अध्याय लिख चुका है। गंगा के लिए संत निगमानंद ने 2008 में 73 दिन का आमरण अनशन किया था जिस से उनके शरीर के कई अंग कमजोर हो गए थे और न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर के भी लक्षण देखे गए थे. और अब 19 फरवरी 2011 से शुरू संत निगमानंद का आमरण अनशन 68वें दिन (27 अप्रैल 2011) को पुलिस गिरफ्तारी के साथ खत्म हुआ था, उत्तराखंड प्रशासन ने उनके जान-माल की रक्षा के लिए गिरफ्तारी की थी. संत निगमानंद को गिरफ्तार करके जिला चिकित्सालय हरिद्वार में भर्ती किया गया। हालांकि 68 दिन के लंबे अनशन की वजह से उन्हें आंखों से दिखाई और सुनाई पड़ना कम हो गया फिर भी वे जागृत और सचेत थे और चिकित्सा सुविधाओं की वजह से स्वास्थ्य धीरे-धीरे ठीक हो रहा था. लेकिन 2 मई 2011 को उनकी चेतना पूरी तरह से जाती रही और वे कोमा की स्थिति में चले गए. जिला चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक पी.के. भटनागर संत निगमानंद के कोमा अवस्था को गहरी नींद बताते रहे। बहुत जद्दोजहद और वरिष्ठ चिकित्सकों के कहने पर देहरादून स्थित दून अस्पताल में उन्हें भेजा गया फिर उनका इलाज जौली ग्रांट स्थित हिमालयन इंस्टिट्यूट हॉस्पिटल में चला .

हिमालयन इंस्टिट्यूट हॉस्पिटल के चिकित्सकों को संत निगमानंद के बीमारी में कई असामान्य लक्षण नजर आए और उन्होंने नई दिल्ली स्थित ‘डॉ लाल पैथलैब’ से जांच कराई और चार मई 2011 को जारी रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि ऑर्गोनोफास्फेट कीटनाशक उनके शरीर में उपस्थित है जो दर्शाता है कि संत निगमानंद को चिकित्सा के दौरान जहर देकर मारने की घिनौनी कोशिश की गई . जहर देकर मारने की इस घिनौनी कोशिश के बाद उनका कोमा टूटा ही नहीं और 42 दिनों की लम्बी जद्दोजहद के बाद वे अनंत यात्रा पर प्रस्थान कर गए. पर संत निगमानंद का बलिदान बेकार नहीं जायेगा. मातृसदन ने अंततः लड़ाई जीती और हरिद्वार की गंगा में अवैध खनन के खिलाफ पिछले 12 सालों से चल रहा संघर्ष अपने मुकाम पर पहुँचा है. 26 मई को नैनीताल उच्च न्यायालय के फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि क्रशर को वर्तमान स्थान पर बंद कर देने के सरकारी आदेश को बहाल किया जाता है.

मातृसदन के संतों ने पिछले 12 सालों में 11 बार हरिद्वार में खनन की प्रक्रिया बंद करने के लिए आमरण अनशन किए. अलग-अलग समय पर अलग-अलग संतों ने आमरण अनशन में भागीदारी की। यह अनशन कई बार तो 70 से भी ज्यादा दिन तक चला . इन लंबे अनशनों की वजह से कई संतों के स्वास्थ्य पर स्थाई प्रभाव पड़ा. मातृसदन ने जब 1997 में स्टोन क्रेशरों के खिलाफ लड़ाई का बिगुल फूंका , तब हरिद्वार के चारों तरफ स्टोन क्रेशरों की भरमार थी जो दिन रात गंगा की छाती को खोदकर निकाले गए पत्थरों को चूरा बनाने का व्यापार करते थे. स्टोन क्रेशर के मालिकों के कमरे नोटों की गडिडयों से भरे हुए थे और सारा आकाश पत्थरों की धूल (सिलिका) से. लालच के साथ स्टोन क्रेशरों की भूख भी बढ़ने लगी तो गंगा में जेसीबी मशीन भी उतर गयीं। बीस-बीस फुट गहरे गड्ढे खोद दिए। जब आश्रम को संतों ने स्टोन क्रेशर मालिकों से बात करने की कोशिश की तो वे संतों को डराने और आतंकित करने पर ऊतारू हो गये तभी संतों ने तय किया कि गंगा के लिए कुछ करना है और तब से उनकी लड़ाई खनन माफियाओं के खिलाफ चल रही थी.

देखिये आजकल कैसी विचित्र हवा बह रही है . भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलनों की बयार में मीडिया अपने आप को आन्दोलनों व् अभियानों के सूत्रधार के रूप में पेश करने की बेशर्मी कर रही है. मीडिया की संवेदनहीनता अपने चरम पर है. क्या जनहित में है और क्या नहीं , इन बातों से मीडिया को कोई सरोकार नहीं है , उसे बस चिंता है तो अपनी TRP की.

संत निगमानंद ढाई महीने से लगातार गंगा में अवैध खनन के विरोध में अनशन कर रहे थे उनकी हिमालयन अस्पताल में हुई मृत्यु से सबसे बड़ा सवाल मीडिया के चरित्र पर फ़िर से उठ खड़ा हुआ है राडिया टेप्स में नामचीन मीडियाकर्मियों की संलिप्तता जनता के सामने आने के बाद से मीडिया खासकर खबरिया चैनलों ने अन्ना हजारे की मुहिम और बाबा राम देव के अनशन को 24घंटे कवरेज देकर समाज में खोई विश्वसनीयता पाने की भरसक कामयाब कोशिश की थी लेकिन संत निगमानंद के संदेहास्पद मौत ने मीडिया की पोल खोल दी है और उसके चरित्र को फिर से उजागर किया है.

संत निगमानंद की संभावित हत्या की खवर पिछले महीने 11 may को इंडिया वाटर पोर्टल के हवाले से आई थी लेकिन तब से लेकर संत निगमानंद की मौत हो जाने तक किसी भी राष्ट्रीय मीडिया ने इसे खबर नहीं बनाया. हालाँकि मौत के बाद आज तक और जागरण ने इसकी खबर जरुर दी. लेकिन संत निगमानंद के मामले से यह स्पष्ट हो गया कि भारतीय मीडिया ब्रांड बनाने और स्थापित ब्रांड के पीछे भागने के अलावा कोई और काम नहीं करती है. हाँ इनका सरकारी विज्ञापनों के लिए राज्य या केंद्र सरकार के अनुसार ख़बरों को तोड़ -मरोड़ कर दिखाने में कोई सानी नहीं है. वैसे भी पत्रकारिता एक पेशा बनकर रह गया है जो ऐसी घटनाओं से दूषित होता जा रहा है.

यदि पिछले तीन महीनों का मीडिया अध्ययन करे तो स्पष्ट होता है कि किस तरह से मीडिया ने अन्ना हजारे को पूरे देश का हीरो बनाया और
बाबा रामदेव अचानक नेपथ्य में गायब हो गये. लेकिन अचानक फ़िर से रामलीला मैदान में अपने अनशन से स्टेज पर उभरे बाबा को मीडिया ने एकजुटता से सपोर्ट नहीं किया. रामलीला मैदान में पुलिसिया कार्यवाई ने मीडिया के रुख में थोड़ी सहानुभूति जरुर पैदा की लेकिन केंद्र सरकार से ” भारत निर्माण ” के विज्ञापन थोक भाव में मिलने से इंडिया टीवी और जी न्यूज को छोड़कर सभी चैनलों ने बाबा की छवि ख़राब करने का अभियान शुरू कर दिया है. सारा मिडिया मानों सत्ता की तूती हो, वैसे भी झूठन पे पलने वालों का जमीर कहाँ होता है ?

कभी रामकिशन यादव को योगगुरु का ब्रांड बनाने वाली मीडिया सरकार के इशारे पर रामदेव की ब्रांड बिगड़ने में इतनी मशगुल रही कि बिना ब्रांड वाले बलिदानी संत निगमानंद के अनशन और उसकी महत्ता को कोई खबर ही नहीं समझा. ये आचरण स्पष्ट करता है की मीडिया कितना जनप्रतिनिधि है.

ये घटनाये स्वस्थ समाज के निर्माण में बाधक हैं और प्रत्येक स्तर पर इसका विरोध होना चाहिए .



Monday, 6 June 2011

माचिस-मानुष





जलते जलते ईर्ष्या से


पहुंचा मौत के घाट


माचिस देख कहने लगी


क्या आया तेरे हाथ ?



झूठ,भोग,माया, अगन


रही जनम भर साथ


खाया पिया मल किया


अब जलता ज्यूँ काठ



मैं माचिस तुझसे भली


हूँ मैं अगन प्रकाश


जीवन सार्थक कर चली


जला के दीपक चार



सीखन को चहुँ ओर है


जो कोई सीखन चाह


लघु को लघु न जानिये


जो जीवन की चाह










Thursday, 2 June 2011

जंग पे जाने से पहले

तुम्हारी नौटंकी से



ऊब चुके हैं लोग


और अब पैने हो गए हैं


उनके नाखून


अपना ही सिर


खुद खुजाते -खुजाते


तुम्हारे वादे सुंदर हैं


ये तुम जानते हो


वैसे ही जैसे


पारिजात का पुष्प


हाँ , तुम्हारी बातें


दिमाग वालों को


चाहे पसंद आती हों


मगर याद रखो


जिन्होंने बहाया है


तुम्हारे लिए खून अपना


कर सकते हैं तिलक अपना भी,


तुम्हारे रक्त से


स्वयं के अस्तित्व की


जंग पे जाने से पहले


Wednesday, 11 May 2011

चर्चा







स्त्रियों के हकों पर एक चर्चा थी


स्त्रियों को उनका हक मिलना चाहिए


स्त्री जीती ही कहाँ है अपना जीवन


उसका तीन चौथाई जीवन जाता है


खुद को मात्र पुरुष से बचाने में


और एक चौथाई जीवन जाता है


इसी पुरुष का जीवन बनाने में


सब जानते है यह बात अच्छे से


आओ चलो कोई और चर्चा करें

Monday, 25 April 2011

सबक





एक नए साथी को सबसे मिलवाना था


उसे कार्यालय से परिचित करवाना था


किताबी ज्ञान परीक्षा में तो उत्तीर्ण था


वास्तविक दर्शन मुझे ही समझाना था


मुझे कार्यालायागत-नैतिकता बताना था


मैं समझाता, पर वह पहले ही जानता था


बड़े आसान शब्दों में उसने समझाया था


रिश्वत मर्द की तरह मांगी जाती है यहाँ


और स्त्री की तरह दी जा रही है यहाँ


ये नियम किसी किताब में नहीं है लिखा


प्रत्येक जानता है जो है लाइन में खड़ा