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Saturday, 25 June 2011



हम अब तैयार हैं अर्थी उठाने के लिए



जाने क्यूँ भूल जाते हैं लोग
सत्ता का महल बनता है
वोटों की छोटी छोटी ईंटें जोड़कर
उम्मीद के गारे से बनाई जाती हैं
ऊंची ऊंची सत्ता की दीवारें,
अपने पसीने की कमाई -चंदे से
पहुंचाते हैं तुम्हें जनमंडप-संसद में
और तुम देखकर व्यंजन वहां के
भूल जाते हो अपनी ही बारात
लेकिन याद रखो हमारी जरुरत
तुम्हें जीते जी ही नहीं है-
मरने के बाद भी हम ही
ले जायेंगे शमशान तक तुम्हें
अब फैसला जल्द करो कि-
मृत्यु रूपसी का वरण
कब करना है तुम्हें
हम अब तैयार हैं अर्थी उठाने के लिए

Kedarnath “kadar”





बुरी तरह आदमी से हारे हैं


आज कल हम कितनी बहस करते हैं, कितने लड़ते झगड़ते हैं व्यर्थ की बातों में और एक दूसरे को दुखी भी करते हैं. रास्ते से जाते समय मैंने देखा कि बहुत से आवारा कुत्ते शादी समारोह से बची झूठन खा रहे हैं. न कोई शोर न गुर्राहट, न कोई झगडा . तब इंसान को सामने रखकर ये पंक्तियाँ उभर आईं जो आप से साँझा कर रहा हूँ जी :-

एक जगह बहुत से कुत्ते
असीम शांति के साथ
खा रहे थे झूठन मिलकर 
बिना किसी नोंक झोंक
बिना गुर्राए , बिना भौंके

आश्चर्यजनक था ये दृश्य
इसलिए जिज्ञासावश मैंने पूछा-


स्वान देव आप लोग आपस में
लड़ते झगड़ते क्यों नहीं हैं?
तब उनका नेता बोला :-
अब हम आपस में नहीं लड़ते
हम शर्म के मारे हैं
इस लड़ने झगड़ने की कला में
बुरी तरह आदमी से हारे हैं





Kedar nath “kadar”


Friday, 24 June 2011






इस दिल से तल्ख़ यादों को मिटा दे

हसरतों को तू कोई और जगह दे


इंसान की काठी कमजोर बहुत है

मिटटी में इसकी कुछ और मिला दे


हसरतों की बरातों को जगह नहीं है

शैतानो की बस्ती को शमशान बना दे


ऐ औरों के खुदा "कादर" की तमन्ना है

जो कर सके प्यार, वो इंसान बना दे


केदारनाथ "कादर"




तुम उषा सी प्रति प्रभात में







तुम उषा सी प्रति प्रभात में


नव वस्त्र पहन प्राची प्रांगन में


करती पदार्पण मम जीवन में


स्मित नयनों में लेकर आशा


धारण कर विश्वास की आशा


नित मुझसे सुनने को प्रसंशा


लेकिन बिन देखे तुमको मैं


कह देता हूँ नहीं पसंद हो


तुम फिर लौट चली जाती हो


कल फिर सज आने को नूतन


तुम उषा सी प्रति प्रभात में



केदारनाथ "कादर"






 




परेशान ये जमीं है



ये परेशान रौशनी है



बुझ रहे हैं जुगनू


आशाओं के रफ्ता -रफ्ता



ढूँढते खुशियाँ हथेलियों में


गिनकर गणित दुखी हैं


खुशियों की चाह में सब


रोते रहे हैं रफ्ता-रफ्ता



सपनों में सहारों को


तूफ़ान में किनारों को


सब चाहते हैं ज़ल्दी


वो मिलते हैं रफ्ता -रफ्ता



देखो उदासी अकेली है


आओ हम गले लगायें


दो दिल उदास मिलकर


हँसते हैं रफ्ता -रफ्ता






-Kedarnath “kadar”

Monday, 20 June 2011

हमको उनपे ऐतबार बड़ा था, खो गया है कहीं

 



हमको उनपे ऐतबार बड़ा था, खो गया है कहीं


हुजूम बड़ा साथ जो उनके था, खो गया है कहीं



उनको ऐतबार बड़ा था, अपनी किये कारनामों पे


देखो वो शख्स गुमनाम अंधेरों में खो गया है कहीं



चढ़ा अजीब नशा उनको देखो, हुकूमत का अपनी


एक विश्वास का मत था उनको, खो गया है कहीं



किस कदर स्वार्थ में डूबे न कुछ भी याद रहा


वो तो इंसान का हक था जो खो गया है कहीं



हाँ, अभी बक्त लगेगा यारो, मगर वो उगेगा जरुर


वो इन्साफ का सूरज था, जो खो गया है कहीं



चूम लूँगा "कादर" उस अँधेरे के कदम होंठों से


बाद जिसके है मेरा सवेरा, जो खो गया है कहीं



Kedarnath “kadar”

जिन्दा रहना है तो फिर हालात बदलना होगा



जिन्दा रहना है तो फिर हालात बदलना होगा


जनमानस को अपने ख्यालात बदलना होगा


हमको ये होता तांडव मृत्यु का छलना होगा


मरने से पहले न मरेंगे निश्चय करना होगा



निशा अँधेरी चहुँ ओर है तम को हरना होगा


मन और तन दोनों को बस में करना होगा



पाना ही होगा स्वाभिमान हमको लड़ना होगा


अब सत्ता वालों को जनता से डरना होगा



अपना हक खुशहाल जीवन उसको पाना होगा


जनमानस को अपना अंदाज़ बदलना होगा



स्वरों को फौलाद बनाकर शोर मचाना होगा


वंचितजन को सत्य दिखा सोच बदलना होगा



नए सवेरे की खातिर संघर्ष भी करना होगा


जिन्दा रहना है तो फिर हालात बदलना होगा





Kedarnath “kadar"