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Friday, 19 August 2011

इसी कारण वे लड़ रहे हैं




सोते लोग चलते नहीं लगते अच्छे
जागे लोग जगाते हुए चल रहे हैं


भीड़ में लोग आगे चल रहे हैं
चिराग उनके दिलों में जल रहे हैं

युद्धरत हैं स्वयं से सिरफिरे से
दूसरों के लिए ही वे जी रहे हैं

जन की,जीवन की, जनहित की
उमंगें वे ही महसूस कर रहे हैं

है गुंथी आभा विरोध की, आत्मा की
वे एक आदिम युग बदल रहे हैं

शब्दों की धार से बैठ अनसन पर
वे सत्ता को कुंठित कर रहे हैं

जीत हो इंसान की, व्यवस्था की
इसी कारण वे लड़ रहे हैं

केदारनाथ "कादर"



अब हो गया है मुझको
मेरे अकेलेपन से ही प्यार
जहाँ मैं हूँ
और तू पिया


अकेलापन मेरा
ले आया तुम्हें
नहीं अब बीच
कोई दूसरा


तुम्हारी सोच है
तुम्हारा साथ भी
कोई जाने नहीं
है हाथों में हाथ भी


फैली जुल्फें
मेरे सीने पे
देखती खुद को
आँखे तेरी


मेरी अधखुली आँखों में
बह रहा है समुद्र
प्रेम का
तैरते हैं जिसमें
हम तुम
मेरे अकेलेपन में
मैंने पाया
स्वर्णिम सुगन्धित
सान्निध्य तेरा


केदारनाथ  "कादर"  




आजाद

आजादी इक ख्याल है
तुम देखो न जागकर
क्यूँ पालते हो स्वप्न
तुम स्वतंत्र भारत के
सपनों के बीज भी
तुमने विदेशी ही चुने
भूल बैठे तुम पुरुषार्थ
रखते रहे बस शर्तें
हुए कहाँ तुम आजाद
आज भी गुलाम सोच
आज भी गुलाम तुम
तोड़ दो ये बंदिशे
और फिर जियो तुम
आजाद होकर निसदिन

केदारनाथ "कादर"

Friday, 5 August 2011

चर्चा बेमानी हो गयी

यारो आजकल ईमान की चर्चा बेमानी हो गयी
बात अब सच्चाई की किस्सा कहानी हो गयी

देखिये हर एक को बनता है पोता गाँधी का
उम्र जिनकी रोज़ खून में नहाते हो गयी

हाथ में खंजर लिए जपते हैं जो राम राम
दौर-ए-अज़ब में जनता उनकी दीवानी हो गयी

जी ही लेंगे चार दिन अब यकीन है हमें
सुनते हैं तारीख चुनावों कि तय हो गयी

अब चुने हम किसको, कसाई हैं सब जगह
दिल की नगरी सबकी कब्र जैसे हो गयी

कृष्ण भी नाराज़ हैं और राम भी हैं खफा
सीता और राधा शाहरुख़ की दीवानी हो गयीं

Kedarnath “kadar”


अबोले-शब्द

बहुत से शब्द अबोले हैं
जब से छुआ है तुमने अँधेरे में
बहुत सी बातें हैं कहनी मुझे
पर सारे मेरे शब्द मदहोश हैं
तुम जो बांधे हो मुझे, प्रिये !
अपने कोमल बाहुपाश में

कुछ जो बोलूँ तो बोलूँ कैसे?
लव ये खोलूँ तो खोलूँ कैसे ?
तेरी छुअन से हुआ झंकृत
मेरा रोम-रोम तनमन का
तेरी यादों में यदि मद इतना
होगा क्या जब तुम होगी , प्रिये!
सच में साकार मेरी बाँहों में


Kedar nath “kadar”

Friday, 29 July 2011


जागो




जागो ! जागो ! जागो !
जागो ! मेरे भाइयो जागो !


समय नहीं है सोने का
न चुपचाप यूँ रोने का
उठो ! दहाड़ के तुम
उठो ! चिंघाड़ के तुम
सिंहासन सोने वालों का
झकझोर कर हिला दो
जागो ! जागो ! जागो !
जागो ! मेरे भाइयो जागो !


लाठी से न डरना तुम
मौत से न डरना तुम
हो जाओ होशियार तुम
हो जाओ तैयार तुम
अत्याचारी व्यवस्था मिटा दो
चेतनासूर्य नया तुम उगा दो


उठो ! दहाड़ के तुम
उठो ! चिंघाड़ के तुम
सिंहासन सोने वालों का
झकझोर कर हिला दो


जागो ! जागो ! जागो !
जागो ! मेरे भाइयो जागो !

केदारनाथ "कादर"



 

हो जाओ होशियार !
हो जाओ तैयार !
मेरे देशवासियों , मेरे देशवासियों

ये काला अन्धकार
हमें नहीं स्वीकार
हे ! शासक कहलाने वालो
तुमको है कोटि धिक्कार

हो जाओ होशियार !
हो जाओ तैयार !
मेरे देशवासियों , मेरे देशवासियों

अब न भूखे मरेंगे हम
अब न जुल्म सहेंगे हम
अब न मूक रहेंगे हम
अपने लिए लड़ेंगे हम

अब शासन बदलेंगे हम
मिलकर मजदूर किसान
हम सब आम इंसान
हो जाओ होशियार !

हो जाओ तैयार !
मेरे देशवासियों , मेरे देशवासियों


केदारनाथ "कादर"