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Sunday, 12 December 2010

पीड़ा



बहुत जानता है तू
बहुत कुछ सीखा है
पंडित है कर्मयोगी है
ज्ञेय है तुझे सब
पढ़ा है ग्रंथों को
जानता है अनेक रहस्य
बता मुझे पीड़ा क्या है ?
कैसी होती है पीड़ा ?
प्रेम की, प्रताड़ना की
प्रताड़ित मन के प्रति
प्रेम से उपजी पीड़ा
जानता भी है तू ?
पीड़ा क्या होती है ?
यदि नहीं तो छोड़
इस पांडित्य ढोंग को
जो तुम्हें एक साधारण
मनुष्य भी नहीं छोड़ता

केदारनाथ"कादर"


4 comments:

  1. यह तो बहुत सुन्दर कविता है.
    पाखी की दुनिया में भी आपका स्वागत है.

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  2. सही है.. हर बातें ग्रंथों में नहीं होती हैं.. कुछ बातें तो सिर्फ महसूस करके ही सीखी जाती हैं..
    अच्छी कविता...

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  3. Aap sabhi ka bahut bahut aabhar ji.

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