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Wednesday, 15 September 2010

एक पाति शब्दों की


आ बैठा हूँ तेरे तट पर
ओ मेरी मन बसनी रजनी
देख रही हो मेरे हृदय में
कलकल करती प्रेम नदी
शब्द पुष्प कुछ चुने हैं मैंने
सब तुमको करता अर्पण
मेरे मुख पर हंसी है तेरी
बिम्ब तेरा मन के दर्पण
लेकिन मन मरू मेरा विकट
जिसमे सिर्फ भटकना मुझको
आज भरे गले से तुमको
सत्य यही करता अर्पण

केदार नाथ "कादर"

http://kedarrcftkj.blogspot.com

9 comments:

  1. क्या आपने हिंदी ब्लॉग संकलक हमारीवाणी पर अपना ब्लॉग पंजीकृत किया है?


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  2. Rajinder Meena ji,

    Bahut bahut aabhar aapka

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  3. लेकिन मन मरू मेरा विकट
    जिसमे सिर्फ भटकना मुझको

    kedar ji virah aur prem me nirlipt darshan ki gahari anubhuti karaane ke liye baut si badhai

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  4. शब्द पुष्प कुछ चुने हैं मैंने
    सब तुमको करता अर्पण
    मेरे मुख पर हंसी है तेरी
    बिम्ब तेरा मन के दर्पण



    Nice lines..


    ashu2aug.blogspot.com

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  5. bahut sundar likha hai aapne.........ati sundar

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  6. Ana ji bahut bahut shukriya aapka, rachna pasand karne ke liye.

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  7. Alok ji,
    Bahut bahu aabahr aapka.

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